विजयनगर के महान राज्य में, महाराज के पास बारह सुंदर बिल्लियाँ थीं — साल के हर महीने के लिए एक। हर रात हर बिल्ली को एक कटोरा गर्म दूध मिलता था।
पर एक समस्या थी। बिल्लियाँ बहुत, बहुत लालची हो गई थीं। वो अपना दूध पीतीं और फिर रसोई में दूसरों का भी पी जातीं।
रसोइए ने शिकायत की। नौकरों ने शिकायत की। महाराज की सुबह का दूध भी गायब होने लगा।
"जो इस समस्या को सुलझाएगा," महाराज ने एलान किया, "उसे सोने के सिक्कों की थैली मिलेगी।"
कई बुद्धिमान लोगों ने कोशिश की। किसी ने रसोई में ताले लगाने का सुझाव दिया — बिल्लियों ने उन्हें पंजे से खोलना सीख लिया। किसी ने पहरेदार लगाने की बात कही — बिल्लियों ने उसे पूरी तरह अपना दोस्त बना लिया।
तब तेनाली रामन मुस्कुराते हुए आगे आए।
"जहाँपनाह, मुझे एक हफ्ता दीजिए।"
उस शाम, गर्म दूध की जगह, तेनाली रामन ने बिल्लियों को इतना गर्म दूध दिया कि उससे भाप उठ रही थी। स्वाभाविक रूप से, पहली बिल्ली ने जो चखा, उसकी जीभ जल गई और वो ज़ोर से चिल्लाई। बाकी ने देखा और ठंडा होने तक रुकने का फैसला किया।
अगली रात, तेनाली रामन ने वही किया। और उसके अगली रात भी।
हफ्ते के अंत तक, सभी बारह बिल्लियों ने एक ज़रूरी सबक सीख लिया: गर्म चीज़ों को पीने से पहले सावधानी से जाँचना पड़ता है।
फिर, आखिरी रात को, तेनाली रामन ने कटोरे वही गर्म दूध से भरे — और रसोई में ठीक वैसे ही ठंडा, सामान्य दूध रख दिया।
हर एक बिल्ली ने सावधानी से, धीरे-धीरे, जल्दी करने से इनकार किया। वो इंतज़ार करती रहीं जब तक उनका अपना कटोरा ठंडा न हुआ — और तब तक वो इतनी खा-पी चुकी थीं कि कहीं जाने का मन नहीं रहा।
रसोई का दूध अछूता रहा।
महाराज इतना हँसे कि उनका सोने का मुकुट लगभग गिर ही गया।
"तेनाली! यह कैसे किया?"
"मैंने उन्हें धैर्य सिखाया, जहाँपनाह," तेनाली रामन ने झुककर कहा। "लालची दिलों को सीखना बहुत मुश्किल होता है — पर एक बार सीख लें, तो भूलते नहीं।"
— The end. —